A Multi Disciplinary Approach To Vaastu Energy

VASTU SHASTRA

वास्तु शास्त्र (Vastu in Hindi)

वास्तुशास्त्र हमारे भारत की प्राचीनतम वैज्ञानिक विधाओं में से एक हैं। ‘वास्तु’ का अर्थ है प्रकृति और हमारे आसपास के वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना। मौजूदा दौर में देखा गया है कि जितने भी नए भवन निर्माण हो रहें हैं, उनमें वास्तु के सिद्धांतों का पालन किया जा रहा है, क्योंकि लोगों को समझ आ गया है कि जो भी निर्माण भवन स्थापत्य कला के अनुरूप नहीं हैं, वहां लोगों को तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मसलन, तमाम तरह की बीमारियां, परिवार में सामंजस्य की कमी, विचारों में मतभेद, धन की कमी एवं कलह आदि। ऐसे में वास्तुशास्त्र भवन, मनुष्य और आसपास के वातावरण में संतुलन स्थापित करता है।

वास्तु शब्द ‘वस निवासे धातु से निष्पन्न होता है, जिसे निवास के अर्थ में ग्रहण किया जाता है। जिस भूमि पर मनुष्यादि प्राणी वास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। इसके गृह, देवप्रासाद, ग्राम, नगर, पुर, दुर्ग आदि अनेक भेद हैं। वास्तु की शुभाशुभ-परीक्षा आवश्यक है। शुभ वास्तु में रहने से वहां के निवासियों को सुख-सौभाग्य एवं समृद्धि आदि की अभिवृद्धि होती है और अशुभ वास्तु में निवास करने से इसके विपरीत फल होता है।

वास्तुशास्त्र में वास्तु शब्द का व्यापक अर्थ है। वास्तु शब्द वस्तु से अंकुरित हुआ है। वे सारे तत्व जिसे ब्रह्मा ने मानसी सृष्टि के उद्देश्य से रचा, आपः अथवा वस्तु कहलाया। जिसमें सूर्य, जल, वायु, पृथ्वी तथा द्दु (आकाश) जैसे तेजस स्वरुप आते हैं।

तेद्द्मवदन् प्रथमा ब्र्ह्मकिल्बिषेद्द्मकूपारः सलिलो मातरिश्वा।
वीडुहरास्तप उग्रं मयोभूरापो देवी: प्रथमजा ऋतस्य।। (अथर्ववेद)


उन्होंने (ईश्वर ने) सबसे पहले ब्रहमा विकार-प्रकृति को व्यक्त किया। उग्र ताप से पहले दिव्य आपः तथा सोम प्रकट हुए। सूर्य, जल, वायु तेजस से युक्त हुए।

विश्वकर्मा ने महाराज पृथु के सहयोग से निर्मित एवं निर्माण निमित्त कार्यों में इन वस्तुओं को सुनियोजित कर वास्तु में परिणित किया। मानसी सृष्टि के वे सारे तत्व जो ब्रहमा द्दारा रचे गए हैं, वास्तु कहलाते हैं| अतः इसकी व्यापकता को केवल भूखण्ड अथवा गृह निर्माण तक सीमित समझना उचित नहीं होगा। सौरमंडल से लेकर भवन की इष्टिका तक के सारे तत्व वास्तुशास्त्र की विषयवस्तु हैं।

कोई भी निर्माण द्रव्य जो नव-निर्मित में परिवर्तित हो जाता है। वह वास्तु संज्ञा से व्यौहारित होता है। ऋग्वेद में वास्तु का सम्बोधन वास्तोष्पति तथा गृह समूह के रूप में हुआ है। अतः भवन से सम्बन्धित ज्ञान वास्तुशास्त्र की प्रमुख इकाई है।

उपहूता भूरिधना सखायः स्वादुसंमुदः। (अथर्ववेद)
हे गृह! आप अन्न-धन से सम्पन्न रहें। आप मधुर पदार्थों से रहते हुए हमारे मित्र बने रहें।
मत्स्य पुराण के अनुसार वास्तु वस शब्द से बना है जिसका अर्थ वास करना है अर्थात वह स्थान जहाँ किसी का वास होता है। महाभूत के अंगों में अनेक देवगणों के वास करने के कारण इसे वास्तु -पुरुष कहा गया।

वास्तु: सामूहिकोनाम दीप्यते सर्वतस्तु यः। (मत्स्य पुराण)
वास्तु वह सामुहिक नाम है जो सभी ओर दीप्त होता है।

प्रकृति का तात्पर्य पंचमहाभूतों से है जो वास्तु के मुख्य अवयव हैं। अतः प्रकृति का ज्ञान ही वास्तु ज्ञान है। प्रकृति वेदों का आधार है। इस तरह वास्तु शास्त्र एक वैदिक ज्ञान है।

भारत की प्राचीन स्थापत्य कला वास्तु विद्दा पर आधारित थी। प्राचीन भारत भवन निर्माण एक सामान्य कार्य मात्र ही नहीं अपितु एक पवित्र धार्मिक संस्कार एवं जीवंत तत्व माना जाता था। हमारे पूर्वजों ने वास्तु शास्त्र को अथर्व वेद की गोद में रखकर हमें अपने आने वाले कल को सौभाग्य पूर्ण, समृद्धशाली एवं सुखी बनाने के लिए सुपुर्द किया था।

हमने उसे पाश्चात्य संस्कृति के चकाचौंध में भुला दिया| परन्तु वास्तु विद्दा स्वयं में अजेय बनी रही।

भवन के भूखण्ड में वास्तु-पुरुष है और वास्तु-पुरुष के अंगों कई देवों का वास है। वास्तु-पुरुष एक महाभूत है। और भवन के नीचे अधोमुख पड़ा होना उसकी नियति। वास्तु-पुरुष को शांत रखना और उसके अंगों पर बसे समस्त देवों को उसकी प्रकृति के अनुरूप प्रसन्न रख उनसे वांछित फल प्राप्त करने की विधि ही मूलतः वास्तु शास्त्र है।

इन्हीं की प्रकृति के अनुसार भवन का निर्माण वांछनीय है। प्राचीन काल में बड़े-बड़े राज प्रसाद, किले, देव मन्दिर, विद्दालय, तालाब, कूप, आदि का निर्माण वेद-पुराण व शास्त्रों द्दारा वर्णित वास्तुविद्दा के आधार पर किया गया।

वास्तुशास्त्र के साहित्य तथा प्राचीन स्मारकों एवं मूर्तियों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में वास्तुशास्त्र पर आधारित तकनीकों का प्रयोग प्राचीन काल से ही हो रहा है। वास्तु कला भारत की प्राचीन परंपरा रही है। लगभग ५ हजार वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी सभ्यता में वास्तु कला के प्रमाण दिखाई पड़ते हैं। सिंधु घाटी में बने घर, स्नानागार, नियोजित गलियां, बाजार इसके साक्षी हैं।

यूनान से आये मेगास्थनीज ने अपने पुस्तक में चन्द्रगुप्त के महल व राज्य के सामान्य भवनों का जो वर्णन किया है वह वास्तु कला के तत्कालीन उत्कर्ष को स्पष्ट करता है। इस काल में भी वास्तु कला अपनी चरम सीमा पर थी। बड़े-बड़े चौतरफे भवन, विस्तृत खुले आँगन, इनकी साज-सज्जा इसके नमूने हैं।

देश में बौद्ध धर्म के विस्तार के काल में जिन स्तूपों आदि का निर्माण हुआ वह तत्कालीन वास्तु कला के ज्ञान को दृष्टि गोचर करता है। बौद्ध धर्म के देश के बाहर कदम रखने से यहाँ की परंपरा एवं सभ्यता के साथ वास्तु कला का भी विस्तार अन्य देशों में हुआ। चीन के फेंगशूइ कला वास्तु कला से बहुत भिन्न प्रतीत नहीं होती है।

यह सर्वविदित है कि ईश्वर की इच्छा के बिना एक सूक्ष्म प्राणी भी अपना स्थान परिवर्तित नहीं कर सकता है। और इन्हीं (शिव) का एक अंश हमारे घर में अनेक देवताओं को साथ लेकर वास्तु-पुरुष के रूप में समाया हुआ है। अपने गृह में विराजमान इन सभी अलौकिक शक्तियों को उनकी प्रकृति के अनुसार सम्मान व व्यवहार देकर ईश्वरीय शुभ फलों का पूर्ण लाभ उठाना वास्तु शास्त्र का उद्देश्य है। 

विश्वकर्म प्रकाश के अनुसार वास्तुशात्र के कारण मानव दिव्यता प्राप्त करता है। वास्तुशास्त्र के अनुयायी केवल सांसारिक सुख ही नहीं वरन दिव्य आनंद की भी अनुभूति करते हैं।

वास्तु में विश्वकर्मा को ही इसका रचेता माना गया है परन्तु शास्त्रों में भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मयं, नारद, अंगनजीत, विशालक्ष, इंद्र, ब्रह्मा, स्वामी कार्तिकेय, नंदीश, शौनक, गर्ग, श्री कृष्ण, अनिरुद्ध, शुक्र व वृहस्पति यह 18 जने वास्तु शास्त्र के सम्पूर्ण ज्ञाता व उपदेशक रहे हैं, जो की सब लोकों में विख्यात रहे हैं जिन्होंने वास्तु के सम्पूर्ण ज्ञान पर आधारित शास्त्रों का निर्माण किया।

वास्तुपुरुष मंडल (Vastu Purush Mandal)

पौराणिक मान्यता अनुसार वास्तु पुरुष की उत्पत्ति भगवान शंकर के पसीने से हुई है। सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र इन्ही पर केंद्रित है। वास्तु शास्त्र अनुसार वास्तु पुरुष पुरुष भूमि पर अधोमुख होकर स्थित हैं। वास्तु पुरुष का सिर ईशान कोण अर्थात उत्तर-पूर्व दिशा की ओर, पैर नैर्ऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर, भुजाएँ पूर्व एवं उत्तर दिशा की ओर तथा टाँगें दक्षिण एवं पश्चिम दिशाओं की ओर हैं। तात्पर्य यह है कि वास्तु पुरुष का प्रभुत्व समस्त दिशाओं में व्याप्त है।

मतस्य पुराण में वास्तु पुरूष के जन्म से सम्बंधित कथा का उल्लेख मिलता है।

एक बार भगवान् शिव एवं दानवों में भयंकर युद्ध छिड़ा जो बहुत लम्बे समय तक चलता रहा। दानवों से लड़ते लड़ते भगवान् शिव जब बहुत थक गए तब उनके शरीर से अत्यंत ज़ोर से पसीना बहना शुरू हो गया। शिव के पसीना की बूंदों से एक पुरुष का जन्म हुआ। वह देखने में ही बहुत क्रूर लग रहा था। शिव जी के पसीने से जन्मा यह पुरुष बहुत भूखा था इसलिए उसने शिव जी की आज्ञा लेकर उनके स्थान पर युद्ध लड़ा व सब दानवों को देखते ही देखते खा गया और जो बचे वो भयभीत हो भाग खड़े हुए। यह देख भगवान् शिव उस पर अत्यंत ही प्रसन्न हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। समस्त दानवों को खाने के बाद भी शिव जी के पसीने से जन्मे पुरुष की भूख शांत नहीं हुई थी एवं वह बहुत भूखा था इसलिए उसने भगवान शिव से वरदान माँगा "हे प्रभु कृपा कर मुझे तीनो लोक खाने की अनुमति प्रदान करें"। यह सुनकर भोलेनाथ शिवजी ने "तथास्तु" कह उसे वरदान स्वरुप आज्ञा प्रदान कर दी।

फलस्वरूप उसने तीनो लोकों को अपने अधिकार में ले लिया, व सर्वप्रथम वह पृथ्वी लोक को खाने के लिए चला। यह देख ब्रह्माजी, शिवजी अन्य देवगण एवं राक्षस भी भयभीत हो गए। उसे पृथ्वी को खाने से रोकने के लिए सभी देवता व राक्षस अचानक से उस पर चढ़ बैठे। देवताओं एवं राक्षसों द्वारा अचानक दिए आघात से यह पुरुष अपने आप को संभाल नहीं पाया व पृथ्वी पर औंधे मुँह जा गिरा। धरती पर जब वह औंधे मुँह गिरा तब उसका मुख उत्तर-पूर्व दिशा की ओर एवं पैर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर थे।

पैंतालीस देवगणो एवं राक्षसगणो में से बत्तीस इस पुरुष की पकड़ से बाहर थे एवं तेरह इस पुरुष की पकड़ में थे। इन सभी पैंतालीस देवगणो एवं राक्षसगणो को सम्मलित रूप से "वास्तु पुरुष मंडल" कहा जाता है जो निम्न प्रकार हैं -

1. शिखी  2. पर्जन्य  3. जयंत  4. महेंद  5. रवि  6. सत्य  7. भृश  8. नभ  9. अनिल 10. पूष  11. वितथ  12. गृहत्क्षत  13. यम  14.गंधर्व  15. भृंगराज 16. मृग 17. पितृगण  18. दौवारिक  19. सुग्रीव  20. पुष्पदंत  21. वरुण  22. असुर  23. शोष  24. पापयक्ष्मा  25. रोग  26. नाग 27. मुख्य   28. भल्लाट  29. सोम  30. सर्प  31. अदिति  32. दिति  33. आप  34. आपवत्स 35. सविता  36. सावित्री 37. जय  38. इंद्र  39. रुद्र  40. रुद्रदास 41. अर्यमा  42. विवस्वान्  43. मित्र  44. पृथ्वी धर  45. ब्रह्मा।

इन पैंतालीस देवगणो एवं राक्षसगणो ने शिव भक्त के विभिन्न अंगों पर बल दिया एवं निम्नवत स्थिति अनुसार उस पर बैठे :

वास्तु पुरुष के शरीर अंगो पर देवताओं का वास :

वास्तु शास्त्र के अनुसार वास्तु पुरुष उलटा सोता है। उसके दोनों पैर नेऋत्य कोण में स्थित है। दोनों पांव के तलवे एक दूसरे से मिले हुए है। इसका सिर ईशान कोण में है। हाथ और पैर की संधियाँ आग्नेय और वायव्य कोण में है। वास्तु पुरुष में शरीर के भिन्न भिन्न अंगों में किन किन देवताओं का वास है। इसका उल्लेख हम नीचे कर रहे है।
• वास्तु पुरुष के मस्तक में शिखी (महादेव) विराजमान है।
• उसके दोनों कानों में पर्जन्य और दिति का अधिपत्य है।
• गले के ऊपर आप देव है।
• दोनों कन्धों में जय और अदिति विराजमान है।
• उसके दोनों स्तनों पर अर्यमा और पृथ्वीधर है।
• ह्रदय के ऊपर आपवत्स है।
• दाहिने हाथ की कोहनी से पहुंचे तक सविता और सावित्री का वास है।
• बांये हाथ की कोहनी से पहुंचे तक रूद्र और रुद्रदास का वास है।
• दोनों जंघाओं पर विवस्वान् और मित्र है।
• वास्तुपुरुष उल्टा सोया हुआ है, इसलिए नाभि के पीछे कमर से थोडा ऊपर पीठ के सामने ब्रम्हा जी मोजूद है।
• जननेन्द्रिय स्थान में इन्द्र और जय है।
• दोनों घुटनों के ऊपर अग्नि और रोग है।
• दाहिने पैर की नली पर पूषा, वितथ, यम, गन्धर्व, भृंगराज और मृग है।
• दूसरे पैर की नली पर दौवारिक (नंदी), सुग्रीव, पुष्पदंत, वरुण, असुर, शोष और पाप यक्ष्मा उपस्थित है।
• दोनों एडी पर पितृ-देवता का स्थान है।

इस तरह से बाध्य होने पर, वह पुरुष औंधे मुँह नीचे ही दबा रहा। उसने उठने के भरपूर प्रयास किये किन्तु वह असफल रहा। अत्यंत भूखा होने के कारण वह अंत में वह जोर जोर से चिल्लाने व रोने लगा व छोड़ने के लिए करुण निवेदन करने लगा। उसने कहा की आप लोग कब तक मुझे इस प्रकार से बंधन में रखेंगे? मैं कब तक इस प्रकार सर नीचे करे पड़ा रहूँगा? मैं क्या खाऊंगा? किन्तु देवता एवं राक्षस गणो द्वारा उसे बंधन मुक्त नहीं किया गया। अंततः इस पुरुष ने ब्रह्मा जी को पुकारा और उनसे खाने को कुछ देने के लिए जोर जोर से करुण रुद्रन करने लगा, तब ब्रह्माजी ने उनकी करुण पुकार सुनकर उससे कहा कि मेरी बात सुनो -

आज भाद्रपदा शुक्ल पक्ष की तृतीया शनिवार एवं विशाखा नक्षत्र है; इसलिए, तुम जमीन पर यूँ ही अधोमुख हो कर पड़े रहोगे किन्तु तीन माह में एक बार अपनी स्थिति यूँ ही लेटे-लेटे बदल सकोगे, अर्थात् 'भाद्रपद' से 'कार्तिक' तक तुम अपना सर पूर्व एवं पैर पश्चिम दिशा की ओर किये लेटे रहोगे। 'मार्गशिरा', 'पुष्यम' एवं 'माघ' माह में तुम दक्षिण दिशा की ओर लेटे रहोगे इस स्थिति में तुम्हारा सर पश्चिम दिशा एवं पैर उत्तर दिशा की ओर रहेंगे। 'फाल्गुन', 'चैत्र' एवं 'बैसाख' के माह के समय तुम्हारा शरीर उत्तर दिशा की ओर रहेगा इस स्थिति में तुम्हारा सिर पश्चिम दिशा की ओर एवं पैर पूर्व दिशा की ओर रहेंगे। "ज्येष्ठ", "आशाण" एवं "श्रावण" के माह के समय तुम्हारा शरीर पूर्व दिशा की ओर रहेगा इस स्थिति में तुम्हारा सिर उत्तर दिशा की ओर एवं पैर पश्चिम दिशा की ओर रहेंगे। तुम चाहे जिस दिशा में लेटे हुए घूमो, किन्तु तुम्हे बायीं करवट से ही लेटे रहना होगा।

इस प्रकार देव व राक्षस गणो द्वारा औंधे मुँह दबाये एवं घेरे जाने पर ब्रह्माजी ने शिव भक्त को वास्तु के देव अर्थात "वास्तुपुरुष" नाम दिया। ब्रह्माजी ने अपना आशीर्वाद देते हुए वास्तुपुरुष से कहा कि संसार भर में जो भी व्यक्ति, भवन, मंदिर, कुआ आदि की नींव रखेगा अथवा निर्माण उस दिशा में करवाएगा जिस दिशा में उस समय तुम देख रहे हो एवं जिस दिशा में तुम्हारे पैर एवं सिर हैं, को तुम परेशान एवं सता कर रख सकते हो।

तुम्हारी पीठ एवं सिर जिस भी दिशा में हो, तुम्हारा पूजन एवं भोग लगाए बिना यदि कोई व्यक्ति भवन अथवा मंदिर आदि की नीव भी रखेगा तो, ऐसे व्यक्ति को तुम दण्डित एवं नष्ट भी कर सकोगे।

ब्रह्माजी के मुख से ऐसा सुनकर वास्तुपुरुष संतुष्ट हुए। इसके बाद से ही वास्तु-पुरुष का पूजन-भोग अनिवार्य रूप से प्रचलन में आया।

इसलिए आज भी वास्तु देवता का पूजन होता है। देवताओं ने उसे वरदान दिया कि तुम्हारी सब मनुष्य पूजा करेंगे। इसकी पूजा का विधान प्रासाद तथा भवन बनाने एवं तडाग, कूप और वापी के खोदने, गृह-मंदिर आदि के जीर्णोद्धार में, पुर बसाने में, यज्ञ-मंडप के निर्माण तथा यज्ञ-यागादि के अवसरों पर किया जाता है। इसलिए इन अवसरों पर यत्नपूर्वक वास्तु पुरुष की पूजा करनी चाहिये।

वास्तु पुरुष ही ‘वास्तु-देवता’ कहलाते हैं। हिन्दू संस्कृति में इस देव की पूजा का जो विधान है वह पूजा साकार एवं निराकार दोनों प्रकार की होती है। साकार पूजा में देवता की प्रतिमा, यंत्र अथवा चक्र बनाकर पूजा करने का विधान है।

वास्तु देवता की पूजा के लिए वास्तु की प्रतिमा एवं चक्र भी बनाया जाता है, जो वास्तु चक्र के नाम से प्रसिद्ध है। वास्तु चक्र अनेक प्रकार के होते हैं। इसमें प्रायः 49 से लेकर एक सहस्त्र तक पद (कोष्ठक) होते हैं। भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न पद के वास्तु चक्र का विधान है। उदाहरण स्वरूप ग्राम तथा प्रासाद एवं राजभवन आदि के अथवा नगर-निर्माण करने में 64 पद के वास्तु चक्र का विधान है। समस्त गृह-निर्माण में 81 पद का, जीर्णोद्धार में 49 पद का, प्रासाद में तथा संपूर्ण मंडप में 100 पद का, कूप, वापी, तडाग और उद्यान, वन आदि के निर्माण में 196 पद का वास्तु चक्र बनाया जाता है।

सिद्धलिंगों की प्रतिष्ठा, विशेष पूजा-प्रतिष्ठा, महोत्सवों, कोटि होम-शांति, मरुभूमि में ग्राम, नगर राष्ट्र आदि के निर्माण में सहस्त्रपद (कोष्ठक) के वास्तु चक्र की निर्माण और पूजा की आवश्यकता होती है। जिस स्थान पर गृह, प्रासाद, यज्ञमंडप या ग्राम, नगर आदि की स्थापना करनी हो उसके नैऋत्यकोण में वास्तु देव का निर्माण करना चाहिये। सामान्य विष्णु-रुद्रादि यज्ञों में भी यज्ञ मंडप में यथास्थान नवग्रह, सर्वतोभद्र मंडलों की स्थापना के साथ-साथ नैऋर्त्यकोण में वास्तु पीठ की स्थापना आवश्यक होती है और प्रतिदिन मंडलस्थ देवताओं की पूजा-उपासना तथा यथा-समय उन्हें आहुतियाँ भी प्रदान की जाती हैं। किंतु वास्तु-शांति आदि के लिए अनुष्ठीयमान वास्तुयोग-कर्म में तो वास्तुपीठ की ही सर्वाधिक प्रधानता होती है। वास्तु पुरुष की प्रतिमा भी स्थापित कर पूजन किया जाता है। वास्तु देवता का मूल मंत्र इस प्रकार है-

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो भवानः।
यत्त्वेमहे प्रतितन्नोजुष- स्वशं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।।

(ऋग्वेद 7।54।1)
इसका भाव इस प्रकार है - हे वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं, इस पर आप पूर्ण विश्वास करें और तदनन्तर हमारी स्तुति- प्रार्थनाओं को सुनकर आप हम सभी उपासकों को आधि-व्याधि से मुक्त कर दें और जो हम अपने निवास क्षेत्र में धन-ऐश्वर्य की कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तु क्षेत्र या गृह में निवास करने वाले हमारे स्त्री-पुत्रादि परिवार-परिजनों के लिए कल्याणकारक हों तथा हमारे अधीनस्थ वाहन तथा समस्त कर्मचारियों का भी कल्याण करें।

वैदिक संहिताओं के अनुसार वास्तोष्पति साक्षात् परमात्मा का ही नामान्तर है क्योंकि वे विश्व ब्रह्माण्ड रूपी वास्तु के स्वामी हैं। आगमों एवं पुराणों के अनुसार वास्तु पुरुष नामक एक भयानक उपदेवता के ऊपर ब्रह्मा, इन्द्र आदि अष्टलोकपाल सहित 45 देवता अधिष्ठित होते हैं, जो वास्तु का कल्याण करते हैं। कर्मकाण्ड ग्रन्थों तथा गृह्य सूत्रों में इनकी उपासना और हवन आदि के अलग-अलग मंत्र निर्दिष्ट हैं। यद्यपि कूप, वापी, ग्राम, नगर और गृह तथा व्यापारिक संस्थान आदि के निर्माण में विभिन्न प्रकार के कोष्ठकों के वास्तु मंडल की रचना का विधान है; किंतु उनमें मुख्य उपास्य देवता 45 ही होते हैं। हयशीर्षपांचरात्र, कपिलपांचरात्र, वास्तुराजवल्लभ आदि ग्रंथों के अनुसार प्रायः सभी वास्तु संबंधी कृत्यों में एकाशीति (81) तथा चतुष्पष्टि (64) कोष्ठात्मक चक्रयुक्त वास्तु वेदी के निर्माण करने की विधि है। इन दोनों में सामान्य अंतर है। एकाशीति पद वास्तुमंडल की रचना में उत्तर-दक्षिण और पूर्व- पश्चिम से 10-10 रेखाएं खींची जाती हैं और चक्र-रचना के समय 20 देवियों के नामोल्लेखपूर्वक  नमस्कार-मंत्र से रेखाकरण- क्रिया सम्पन्न की जाती है।

विभिन्न उपलक्षों पर वास्तुपुरुष के पूजन का अनिवार्य रूप से विधान है। भगवान ब्रह्मा जी के वरदान स्वरूप जो भी मनुष्य भवन, नगर, उपवन आदि के निर्माण से पूर्व वास्तुपुरुष का पूजन करेगा वह उत्तम स्वास्थ्य एवं समृद्धि संपन्न रहेगा। यूँ तो वास्तु पुरुष के पूजन के अवसरों की एक लंबी सूची है लेकिन मुख्य रूप से वास्तु पुरुष की पूजा भवन निर्माण में नींव खोदने के समय, गृह का मुख्य द्धार लगाते समय, गृह प्रवेश के समय, पुत्र जन्म के समय, यज्ञोपवीत संस्कार के समय एवं विवाह के समय अवश्य करनी चाहिए।

देवताओं ने वास्तु पुरुष से कहा तुम जैसे भूमि पर पड़े हुए हो वैसे ही सदा पड़े रहना और तीन माह में केवल एक बार ही दिशा बदलना।

उपर्युक्त तथ्यों को देखते हुए हमे किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य वास्तु के अनुरूप ही करना चाहिए।

अगर वास्तुपुरुष की इस औंधे मुंह लेटी हुई अवस्था के अनुसार भूखंड की लंबाई और चौड़ाई को 9-9 भागों में बांटा जाए तो इस भूखंड के 81 भाग बनते हैं जिन्हें वास्तुशास्त्र में पद कहा गया है जिस पद पर जो देवता वास करते हैं उन्हीं के अनुकूल उस पद का प्रयोग करने को कहा गया है। वास्तुशास्त्र में इसे ही 81 पद वाला वास्तु पुरुष मंडल कहा जाता है।

निवास के लिए गृह निर्माण में 81 पद वाले वास्तु पुरुष मंडल का ही विन्यास और पूजन किया जाता है। समरांगण सूत्रधार के अनुसार वास्तु पुरुष मंडल में कुल 45 देवता स्थित है। जिसमे मध्य के 9 पदों पर ब्रह्मदेव स्वयं स्थित हैं।

ब्रह्म पदों के चारो ओर 6-6 पदों पर पूर्व में अर्यमा (आदित्य देव), दक्षिण में विवस्वान (मृत्युदेव), पश्चिम में मित्र (हलधर) तथा उत्तर में पृथ्वीधर (भगवान अनंत शेषनाग) स्थित हैं। ये मध्यस्थ देव हैं।

ठीक इसी प्रकार मध्यस्त कोणों के भी देव हैं - ईशान्य में आप (हिमालय) और आपवत्स (भगवान शिव की अर्धांगिनी उमा), आग्नेय में सविता (गंगा) एवं सावित्र (वेदमाता गायत्री) नैऋत्य में जय (हरि इंद्र) तथा वायव्य में राजयक्ष्मा (भगवान कार्तिकेय) और रुद्र (भगवान महेश्वर) जो एक-एक पदों पर स्थित हैं।

फिर वास्तुपुरुष मंडल के बाहरी 32 पदों के देव हैं - शिखी (भगवान शंकर), पर्जन्य (वर्षा के देव वृष्टिमान), जयंत (भगवान कश्यप), महेंद्र (देवराज इंद्र), रवि (भगवान सूर्यदेव), सत्य (धर्मराज), भृश (कामदेव), आकाश (अंतरिक्ष-नभोदेव), अनिल (वायुदेव-मारुत), पूषा (मातृगण), वितथ (अधर्म), गृहत्क्षत (बुधदेव), यम (यमराज), गंधर्व (पुलम- गातु), भृंगराज व मृग (नैऋति देव), पित्र (पितृलोक के देव), दौवारिक (भगवान नंदी, द्वारपाल), सुग्रीव (प्रजापति मनु), पुष्पदंत (वायुदेव), वरुण (जलों-समुद्र के देव लोकपाल वरुण देव), असुर (सिंहिका पुत्र राहु), शोष (शनिश्चर), पापयक्ष्मा (क्षय), रोग (ज्वर), नाग (वाशुकी), मुख्य (भगवान विश्वकर्मा), भल्लाट (येति, चन्द्रदेव), सोम (भगवान कुबेर), भुजग (भगवान शेषनाग), अदिति (देवमाता, मतांतर से देवी लक्ष्मी), दिति (दैत्यमाता) हैं । इनमें से 8 अंदर के एक-एक अतिरिक्त पदों के भी अधिष्ठाता हैं।

भवन के भूखंड में वास्तु-पुरुष के नीचे अधोमुख पड़े होने की परिकल्पना की गई है। वास्तु-पुरुष के अंगों पर कई देवों का वास है। वास्तु-पुरुष एक महाभूत है और इसका भवन के नीचे अधोमुख पड़ा होना उसकी नियति। अधोमुख वास्तु-पुरुष की एक विशेष मुद्रा है। इस मुद्रा-आलेख को ध्यान में रखकर भूखंड के विभिन्न भागों पर रहे देवों की परिकल्पना की गई है।

समरांगण सूत्रधार के अनुसार वास्तु पुरुष मंडल में कुल 45 देव स्थित हैं। इस के मध्य के नौ पदों पर कमल-भू-ब्रह्मा स्वयं स्थित है। ब्रह्म पदों के चारों ओर छ:-छ: पदों पर पूर्व में अर्यमा, पश्चिम में में मित्र, उत्तर में पृथ्वीधर तथा दक्षिण में विवस्वान स्थित हैं। ये मध्स्थ देव हैं। इसी प्रकार मध्यस्थ कोणों के देव हैं - आग्नेय में सविता एवं सावित्र, नैऋत्य में जय और इंद्र, वायव्य में पापयक्ष्मा और रूद्र तथा ईशान में आप और आपवत्स, जो एक-एक पदों पर स्थित हैं। वास्तु पुरुष मंडल के बाहरी 32 पदों के देव है - शिखी, पर्जन्य, जयंत, इंद्र, रवि, सत्य, भृश, नभ, अनिल, पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गंधर्व, भृंगराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदंत, वरुण, असुर, शोष, पापयक्ष्मा, रोग, नाग, मुख्य, भल्लाट, सोम, चरक, अदिति तथा दिति। इनमें से आठ अंदर के एक-एक अतिरिक्त पदों के भी अधिष्ठाता हैं।

मत्स्य पुराण के अनुसार बुध पुरुषों को भवन के विभिन्न पदों पर स्थित देवों में बत्तीस देवों का पूजन बाह्य में तथा अंत में तेरह देवों का पूजन करना चाहिए।

वास्तु पुरुष मंडल में स्थित शिखी या अग्नि वस्तुतः मोक्षदाता भगवान शंकर ही हैं। पर्जन्य नाम वाले देव कोई और नहीं, जल के देव वृष्टिमान हैं। भगवान कश्यप को जयंत कहा गया है तथा विवस्वान नाम से आदित्य को पुकारा गया है। सत्य नाम से धर्म तथा भृश नाम से कामदेव को पुकारा गया है। अंतरिक्ष को नभोदेव के लिए, मारुत को वायु देव के लिए तथा पूषा को मातृगण के लिए प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार वितथ नाम से अधर्म को, ग्रहक्षत नाम से बुध को, यम तथा गृहत्क्षत नाम से नारद देव को संबोधित किया गया है। निऋति देव को भृंगराज तथा मृग नाम की संज्ञा दी गई है। वास्तु पुरुष में पितृ लोक के देवों को पितृगण नाम से, दौवारिक नाम से नंदी को, सुग्रीव के नाम से सृष्टिकर्ता मनु को, पुष्पदंत के नाम से वायुदेव को, वरुण नाम से जलो के मालिक एवं लोकपाल समुद्र का आवाहन किया गया है। असुर नाम से राहु, शोष नाम से शनिश्चर, पाप-यक्ष्मा नाम से क्षय तथा रोग नाम तथा रोग नाम से ज्वर को प्रतिपादित किया है। नाग नाम से सर्पों के मालिक वासुकि शेषनाग का संबोधन किया गया है। उसी प्रकार मुख्य नाम से विश्वकर्मा देव को, भल्लाट नाम से चंद्रदेव को तथा अदिति नाम से देवी लक्ष्मी को पूजित किया गया है। वास्तु पुरुष की परिकल्पना में दिति के नाम से भगवान शंकर को, आप नाम से हिमालय को, आपवत्स नाम से भगवान शिव की अर्धांगिनी उमा को, अर्यमा नाम से आदित्य देव को, सावित्र नाम से वेदमाता गायत्री का आवाहन किया गया है। सविता नाम नदियों में श्रेष्ठ गंगा के लिए आया है तथा विवस्वान नाम को मृत्यु के लिए पुकारा गया है। वास्तु स्थित देवगणों में जय नाम से हरि इंद्र को, मित्र नाम से हलधर, रूद्र नाम से महेश्वर, राजयक्ष्मा नाम से कार्तिकेय तथा पृथ्वीधर से भगवान अनंत शेषनाग देव को आवाहन किया गया है।

विभिन्न पदों पर स्थित देव उस भूभाग के अधिष्ठाता हैं तथा अपनी प्रकृति के अनुरूप फल देते है। गृह के निर्माण काल में कक्षों का निर्धारण आदि तदनुसार किया जाना चाहिए। तत्पश्चात गृह का प्रयोग एवं हर कार्य भूभाग के अधिष्ठाता के अनुरूप ही शुभ होता है। वास्तुपुरुष के प्रत्येक अंग-पद में स्थित देवता के अनुसार उनका सम्मान करते हुए उसी अनुरूप भवन का निर्माण, विन्यास एवं संयोजन करने की अनुमति शास्त्रों में दी गयी है। ऐसे निर्माण के फलस्वरूप वहां निवास करने वालों को सुख, सौभाग्य, आरोग्य, प्रगति व प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।

इसलिए वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि किसी भवन का निर्माण वास्तु पुरूष मंडल के अनुसार किया जाता है तो इमारत में समृद्धि होती है और निवासियों को हमेशा खुशहाली, स्वास्थ्य, संतुष्टी, निरंतर समृद्धि और धनलाभ होता है।

 एक घर में कमरे बनाने के दौरान, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि उस क्षेत्र के किसी भी देवता का वास्तु पुरूष मंडल में अपमान न हो। इसलिए वास्तु शास्त्र हर समय सभी देवताओं को खुश रखने के लिए दिशा-निर्देश और सिद्धांत देता है।

इशान्यां देवता गृहम्, पूर्वस्यां स्नानमंदिरम्।

आग्नेयां  पाक सदनं भांडारं गृहमुत्तरे।

आग्नेयपूर्वयोर्मध्ये दधिमंथन मंदिरम्।

अग्निप्रेतेशयोर्मध्ये आज्यगेहं प्रशस्यते।

याम्य नैऋत्योर्मध्ये पुरुषत्यागमंदिरम।

नैऋत्याम्बुजपयोर्मध्ये विद्याभयस्य मंदिरम।

पश्चिमानिलयोर्मध्ये रोदनार्थ गृह स्मरतम्।

वायव्योत्तरमध्ये रति गेहं प्रशस्यते।

उत्तरेशानयोर्मध्ये औषधार्य तू कारयेत्।

नैऋत्यां सूतिकागेहं  नृपाणान् भूतिमिच्छता।

ईशान (North East) कोण में देवता का गृह, पूर्व (East) दिशा में स्नान गृह, अग्निकोण (South East) में रसोई बनाना चाहिए। उत्तर (North) में भंडार गृह, अग्निकोण व पूर्व दिशा के मध्य (East East South) दही मथने का कार्य, अग्नि कोण और दक्षिण ( South South East) में घी  स्थान बनाना चाहिए।

दक्षिण व नैऋत्य के मध्य (South South East)  शौच करने का स्थान, नैऋत्य और पश्चिम (West West South) दिशा के मध्य विद्याभ्यास का स्थान बनाना चाहिए।

पश्चिम और वायव्य  के मध्य (West West North) रोदन गृह का स्थान, वायव्य और उत्तर (North North West) के मध्य रतिस्थान बनाना चाहिए।

उत्तर दिशा और ईशान के मध्य  (North North East) औषधि स्थान, और नैऋत्य कोण (South West) में सूतिका गृह या औजार (Tools) स्थान बनाना वास्तु सम्मत निर्माण होता है।

(विश्वकर्माप्रकाश वास्तुशास्त्रं)

इस प्रकार प्राचीन वास्तुशास्त्र - विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र में क्रमशः 16 दिशाओं का वर्णन विस्तार से है।

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Engineer Rameshwar Prasad

(B.Tech., M.Tech., P.G.D.C.A., P.G.D.M.)

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